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प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद पर प्रश्चाद �
प्रेसा चलता है, पर मैं कलकटा से हूँ तो मुझे यह समझ में आता है
इसका कोई दिबट नहीं पेसेगा, यह आपका पीसा है, रखे नहीं तो वो ज़िन चला जाएगा
पेसे मुख रहे यह अच्छे से पेसे रखता है, बहुत रही से गया ज़िन वो मात हो गया
वो तो मैं हुई नहीं पेसे चलता है, इंडिया यह बारगाउन रहा है क्या यह बारगाउन रहा है? जी